बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में 121 सीटों पर गुरुवार को रिकॉर्ड 64.69% मतदान हुआ, जो 2020 के 56.1% से 8% अधिक है। यह राज्य के इतिहास में पहले चरण का सर्वोच्च मतदान प्रतिशत है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यह उच्च मतदान एंटी-इंकम्बेंसी का संकेत है या नीतीश कुमार सरकार के प्रति समर्थन।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर 2025 को संपन्न हुई, जिसमें नौ डिवीजनों—दरभंगा, तिरहुत, कोसी, सारण, मुंगेर और भागलपुर—की 121 सीटों पर मतदान हुआ। कुल 3.75 करोड़ मतदाताओं में से 2.42 करोड़ ने वोट डाला, जो 2020 के पहले चरण के 2.06 करोड़ से 36 लाख अधिक है। 2020 में कुल मतदाता 3.70 करोड़ थे, जबकि 2015 में वोटिंग 55.9% और 2010 में 52.1% रही।
यह रिकॉर्ड मतदान राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस छेड़ रहा है। आमतौर पर उच्च मतदान को बदलाव की मांग माना जाता है, लेकिन कई उदाहरण इसके विपरीत हैं। उदाहरणस्वरूप, 2023 के मध्य प्रदेश चुनाव में 77% मतदान के बावजूद बीजेपी सत्ता में लौटी। इसी तरह, 2010 के बिहार चुनाव में 6.82% अधिक वोटिंग पर जनता दल (यूनाइटेड) गठबंधन जीता। वहीं, 2023 राजस्थान में 74.45% मतदान पर कांग्रेस हारी, और 2012 यूपी में 13.44% बढ़ोतरी पर बसपा सत्ता से बाहर हुई।
इन 121 सीटों पर 2020 में एनडीए को 60 और महागठबंधन को 61 सीटें मिली थीं। अब प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के प्रवेश से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। एनडीए इसे जनविश्वास का प्रतीक मान रहा है, जबकि महागठबंधन बदलाव की आहट बता रहा है।
महिला मतदाताओं की सक्रियता खास रही, जो नीतीश कुमार की ताकत रही हैं। महागठबंधन ने हर महिला को 30,000 रुपये का वादा किया, जबकि नीतीश सरकार ने 10,000 रुपये की सहायता योजना शुरू की। विश्लेषक कहते हैं कि स्थानीय मुद्दे जैसे बेरोजगारी और पलायन परिणाम तय करेंगे। अब नजरें 11 नवंबर को दूसरे चरण पर हैं, और नतीजे 14 नवंबर को आएंगे।