आज के समय में, बच्चे न होने को सामान्य मान लिया गया है, फिर भी लोगों से यह पूछना कि बच्चे क्यों नहीं हैं, घुसपैठपूर्ण, पाखंडपूर्ण, गहराई से ट्रिगर करने वाला और असंवेदनशील है।
यह लेख भारत टुडे में प्रकाशित हुआ है, जो बच्चे न रखने के फैसले पर सवाल उठाने की प्रथा पर प्रकाश डालता है। लेख में कहा गया है कि बच्चे न होने को अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य वास्तविकता माना जाता है। फिर भी, इस सवाल को पूछना व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप करता है और भावनात्मक रूप से हानिकारक हो सकता है। कीवर्ड्स में चाइल्ड फ्री, पेरेंटिंग, पेरेंटहुड और डिंक कपल्स शामिल हैं। प्रकाशन तिथि 20 जनवरी 2026 है। यह सवाल न केवल निजी जीवन में दखल देता है, बल्कि समाज की बदलती धारणाओं को नजरअंदाज करता है।