महाराष्ट्र के बीएमसी चुनावों में महायुति ने बड़ी जीत हासिल की है, जिससे भाजपा का पहली बार मेयर बनना तय हो गया है। 25 साल बाद शिवसेना का किला ढह गया, जबकि ठाकरे बंधुओं की एकजुटता मतदाताओं को आकर्षित नहीं कर सकी। यह नतीजे महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में बड़ा बदलाव लाते हैं।
मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति में उलटफेर कर दिया है। 17 जनवरी 2026 को घोषित परिणामों के अनुसार, भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर 118 सीटें जीतीं, जिसमें भाजपा को 89 और शिंदे गुट को 29 सीटें मिलीं। बहुमत के लिए 114 सीटों की जरूरत थी, जो महायुति ने पार कर ली। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 65 सीटें मिलीं, जबकि एमएनएस को 6, कांग्रेस को 24 और एआईएमआईएम को 8 सीटें प्राप्त हुईं।
यह चुनाव 9 साल बाद हुए, और इससे पहले मार्च 2022 से बीएमसी प्रशासकों के भरोसे चल रही थी। एशिया की सबसे अमीर नगरपालिका होने के नाते, बीएमसी का वार्षिक बजट 74,400 करोड़ रुपये से अधिक है। 25 साल से शिवसेना के नियंत्रण में रही बीएमसी में अब पहली बार भाजपा का मेयर बनेगा, जो ठाकरे परिवार की विरासत पर गहरा सवाल खड़ा करता है।
ठाकरे बंधुओं—उद्धव और राज—की एकजुटता के बावजूद मतदाताओं ने उन्हें नकार दिया। कारणों में एंटी-इंकंबेंसी, मराठा-केंद्रित राजनीति का असफल होना, उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा का बैकलैश और मुस्लिम वोटरों का दूर होना शामिल है। उद्धव ने महा विकास अघाड़ी से दूरी बनाई और भाई से हाथ मिलाया, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस पर जोर देकर जनता से कनेक्ट करने में नाकाम रहे।
विशेष रूप से, संताक्रूज के वार्ड 90 में कांग्रेस की ट्यूलिप मिरांडा ने भाजपा की ज्योति उपाध्याय को महज 7 वोटों (5,197 बनाम 5,190) से हराया। वहीं, मलाड वेस्ट के वार्ड 46 में भाजपा की योगिता कोली ने एमएनएस की स्नेहिता देहलिकर को 21,717 वोटों के अंतर से रिकॉर्ड जीत दिलाई।
महायुति ने महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों में से 25 में जीत हासिल की, जिसमें पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ भी शामिल हैं, जहां पवार परिवार को झटका लगा। ये नतीजे भाजपा की मजबूती दिखाते हैं, लेकिन संपादकीय टिप्पणियों के अनुसार, अब नागरिक मुद्दों—जैसे जलभराव, सड़कें और कचरा—पर ध्यान देना जरूरी है। भाजपा को विपक्ष के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि पिछले फंड वितरण में 99 प्रतिशत विकास राशि महायुति क्षेत्रों तक सीमित रही थी।
यह जीत देवेंद्र फडणवीस के लिए फायदेमंद है, जो सहयोगियों को नियंत्रित रखने में मदद करेगी। राष्ट्रीय स्तर पर, यह क्षेत्रीय दलों के लिए संदेश है कि सब-नेशनलिज्म अकेला पर्याप्त नहीं।