दिल्ली हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने पेरू की अपील खारिज कर दी है जिसमें भारत में ‘पिस्को’ ब्रांडी के लिए विशेष भौगोलिक संकेत (जीआई) अधिकार मांगे गए थे। अदालत ने एकल जज के आदेश को बरकरार रखा जिसमें ‘पेरूवियन पिस्को’ और ‘चिलियन पिस्को’ के रूप में वर्गीकरण किया गया। कोर्ट ने विवाद को ‘दो देशों की कहानी’ करार दिया।
बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट ने पेरू की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें ‘पिस्को’ को बिना देश के उपसर्ग के स्टैंडअलोन जीआई के रूप में पंजीकृत करने की मांग की गई थी। जस्टिस सी हरी शंकर और ओम प्रकाश शुक्ला की बेंच ने पिछले साल जुलाई के एकल जज के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पेरू के लिए ‘पेरूवियन पिस्को’ और चिली के लिए ‘चिलियन पिस्को’ का वर्गीकरण किया गया था। बेंच ने कहा, “हम स्पष्ट हैं कि पेरू को जीआई पिस्को को स्टैंडअलोन जीआई के रूप में पंजीकरण की अनुमति नहीं दी जा सकती।” विवाद को ‘दो देशों की कहानी’ बताते हुए कोर्ट ने उपभोक्ताओं में भ्रम से बचने का हवाला दिया। पेरू ने दावा किया कि शराब का उद्गम 17वीं सदी में पेरू के दक्षिणी इका और पिस्को वैली में हुआ, और 82 देशों में बिना उपसर्ग के मान्यता है। सितंबर में पेरू ने कहा कि वह ‘पेरूवियन पिस्को’ के मालिक बनने में कम रुचि रखता है। चिली की एसोसिएशन डे प्रोडक्टोर्स डे पिस्को ए.जी. ने कहा कि उत्पादन चिली के अताकामा क्षेत्र और कोक्विम्बो शहर में होता है, और एक सदी से चिली से जुड़ा है। कोर्ट ने चिली पर गलत उपयोग का आरोप आधारहीन पाया। पृष्ठभूमि: 2009 में रजिस्ट्रार ने दोनों को जीआई दिए। 2018 में आईपीएबी ने पेरू को दिया, जिसके खिलाफ 2020 में चिली हाईकोर्ट गई। कोर्ट ने पेरू को मौजूदा पंजीकरण समर्पित करने की छूट दी।