हरियाणा में कपास की खेती गुलाबी बोलवर्म के लगातार हमलों के कारण तेजी से कम हो रही है, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। उपज आधी से भी कम रह गई है, जिससे कई किसान धान की ओर रुख कर रहे हैं। सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं के बावजूद यह रुझान उलट नहीं पड़ा है।
हिसार जिले के कृतन गांव में किसान सत्यवान, जो 25 वर्षों से कपास उगा रहे हैं, बताते हैं कि पिछले साल 5 एकड़ में ₹15,000 का नुकसान हुआ। उन्होंने कहा, “बीज, खाद, डीजल और कटाई के खर्च जोड़ें तो नुकसान साफ दिखता है।” पड़ोसी दयानंद ढाका ने बताया कि उन्हें प्रति एकड़ 3-4 क्विंटल ही मिला, जिससे ₹40,000 का घाटा हुआ। उन्होंने निजी खरीदारों को ₹6,200 प्रति क्विंटल बेचा, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य से ₹1,600 कम था। बीमा कराया लेकिन पैसे नहीं मिले। गुलाबी बोलवर्म 2014 से फसल नष्ट कर रहा है, जो बीटी कपास के प्रति प्रतिरोधी हो गया है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले खरीफ मौसम में प्रति एकड़ ₹15,143 का औसत नुकसान हुआ। कुल लागत ₹40,024 प्रति एकड़, उपज 4 क्विंटल। हिसार में ₹17,515 का नुकसान। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से 2019-20 में 0.72 मिलियन हेक्टेयर से घटकर 2024-25 में 0.40 मिलियन रह गया। विनय मेहला, सहायक वैज्ञानिक ने कहा, “पहले 10-12 क्विंटल मिलते थे, अब आधे से कम। बाढ़ ने स्थिति बिगाड़ी।” सिरसा में कपास क्षेत्र 34.62% घटा, धान 55.18% बढ़ा। ‘मेरा पानी-मेरी विरासत’ योजना में ₹8,000 प्रति एकड़, देशी कपास पर ₹3,000, लेकिन किसान नहीं अपनाते। मजदूर इशवार और बिरमती बताते हैं कि कपास चुनाई से रोजगार कम हुआ, अब निर्माण कार्य कर रहे। इससे अर्थव्यवस्था प्रभावित, आयात बढ़ सकता है।