भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में यह 95.36 के आसपास रहा। इस साल की शुरुआत से अब तक यह करीब 5.64 प्रतिशत गिर चुका है।
भारतीय रुपये पर दबाव पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध से पहले से ही था। पिछले साल यह डॉलर के मुकाबले लगभग 5 प्रतिशत गिरा था। समस्या वर्तमान खाता और पूंजी खाते दोनों पर है।
वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें ऊर्जा बाजार में व्यवधान के कारण ऊंची बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड वर्तमान में 113 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। अप्रैल में भारतीय कच्चे तेल की टोकरी की औसत कीमत 114.48 डॉलर प्रति बैरल रही, पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण सेल के आंकड़ों के अनुसार। 2026-27 में वर्तमान खाता घाटे के 2 प्रतिशत तक बढ़ने की संभावना है।
इस साल अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने शेयर बाजारों से 21.2 अरब डॉलर निकाल लिए हैं। पिछले साल 18.9 अरब डॉलर का बहिर्वाह हुआ था। रिजर्व बैंक ने रुपये पर दबाव कम करने के कदम उठाए हैं, लेकिन इसका शॉर्ट डॉलर बुक बढ़ गया है और दबाव बना हुआ है।
खुदरा ईंधन कीमतें अभी वैश्विक मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करतीं, लेकिन तेल कंपनियों और सरकार पर बोझ की सीमा है। युद्ध दो महीने से अधिक चला है। पंप पर ऊंची कीमतें खुदरा महंगाई को बढ़ाएंगी, जो मार्च में 3.4 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। हाल ही में वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर की कीमत 993 रुपये बढ़ाई गई।