बरेली सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री को इस्तीफे के बाद निलंबित किया गया

उत्तर प्रदेश सरकार ने बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री को उनके इस्तीफे के बाद निलंबित कर दिया है। उन्होंने जिलाधिकारी आवास पर बंधक बनाए जाने के आरोप लगाए थे, जिसे प्रशासन ने खारिज किया। विभागीय जांच के आदेश दिए गए हैं और निलंबन के दौरान उन्हें जीवन निर्वाह भत्ता मिलेगा।

बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने 26 जनवरी 2026 को सोमवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के साथ उन्होंने जिला प्रशासन और जिलाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि उन्हें डीएम आवास पर करीब 45 मिनट तक जबरन रोका गया, मानसिक दबाव बनाया गया। फोन पर लखनऊ से आए कॉल में कथित तौर पर कहा गया, "ब्राह्मण के बहुत दिमाग खराब हो रहे हैं, इसे यहीं बिठा लो।" अग्निहोत्री ने कहा कि उन्हें अपनी जान बचाकर वहां से निकलना पड़ा।

प्रशासन ने इन आरोपों का खंडन किया। एडीएम न्यायिक देश दीपक सिंह ने कहा कि यह सामान्य प्रशासनिक बैठक थी, जिसमें एडीएम प्रशासन, एडीएम सिटी, एसएसपी और वे खुद मौजूद थे। "बातचीत सामान्य माहौल में हुई। उन्हें चाय, कॉफी और मिठाई दी गई। किसी तरह का दबाव या बंधक बनाने जैसी कोई स्थिति नहीं थी," उन्होंने स्पष्ट किया।

इस्तीफे के बाद आधी रात करीब 12:30 बजे अग्निहोत्री ने सरकारी आवास से अधिकतर सामान निकलवा लिया और कार से अज्ञात स्थान की ओर चले गए। हालांकि, उन्हें अभी चार्ज हैंडओवर करना बाकी है।

27 जनवरी 2026 को यूपी सरकार ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। शासन का कहना है कि प्रथम दृष्टया उनके आचरण से प्रशासनिक अनुशासन प्रभावित हुआ। बरेली मंडलायुक्त जांच करेंगे। निलंबन के दौरान वे शामली जिलाधिकारी कार्यालय से संबद्ध रहेंगे और केवल जीवन निर्वाह भत्ता पाएंगे।

अपने पांच पेज के इस्तीफा पत्र में अग्निहोत्री ने यूजीसी के 2026 नियमों का विरोध किया, जो सामान्य वर्ग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, भूमिहार) के छात्रों को प्रभावित करेंगे। उन्होंने माघ मेला में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों की चोटी खींचे जाने की घटना का जिक्र किया, इसे ब्राह्मण समाज के अपमान के रूप में देखा। उन्होंने सरकार पर डिवाइड एंड रूल नीति का आरोप लगाया और नियमों को वापस लेने की मांग की।

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उत्तर प्रदेश सरकार ने बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री को अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया है, जो नए यूजीसी नियमों और ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ कथित पूर्वाग्रह के विरोध में इस्तीफा दे चुके थे। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुई कथित दुर्व्यवहार का भी विरोध किया।

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