मंगलवार को जारी नई एनसीईआरटी कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि महात्मा गांधी और अधिकांश कांग्रेस नेताओं ने 1947 में देश के विभाजन का विरोध किया था, लेकिन उन्होंने इसे एकमात्र रास्ता मानकर स्वीकार कर लिया। पुरानी किताब में विभाजन को 'लगभग अपरिहार्य' बताया गया था। यह पुस्तक स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन पर विस्तृत जानकारी देती है।
नई पुस्तक 'Exploring Society: India and Beyond Part 2' में 1857 की क्रांति से लेकर 1947 तक के कालखंड को कवर किया गया है, जिसमें बंगाल विभाजन और भारत विभाजन शामिल हैं। इसमें उल्लेख है कि इतिहासकार ब्रिटेन के भारत से बाहर जाने के कारणों पर बहस करते हैं; पहले यह गांधी की अहिंसा और कांग्रेस की नीतियों को श्रेय दिया जाता था, लेकिन अब लोकप्रिय विद्रोह, क्रांतिकारियों के प्रयास, रॉयल इंडियन एयर फोर्स और नेवी में विद्रोह, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की कमजोर स्थिति तथा उपनिवेशवाद के अंत की वैश्विक प्रवृत्ति को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
विभाजन खंड के अंत में पुरानी किताब में केवल स्वतंत्रता की खुशी के साथ विभाजन की पीड़ा और हिंसा का उल्लेख था। नई किताब में 'डायरेक्ट एक्शन डे' (अगस्त 1946) पर विस्तार से बताया गया है कि कलकत्ता में सांप्रदायिक हिंसा की लहर चली, जिसमें उत्तेजक भाषणों और पर्चों से प्रेरित मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर हमला किया, जिसका जवाबी हमला हुआ, हजारों की मौत हुई और हजारों विस्थापित हुए। इससे शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व असंभव लगने लगा और विभाजन अपरिहार्य हो गया। पुरानी किताब में केवल कलकत्ता में दंगे और हजारों मौतों का संक्षिप्त उल्लेख था।
जलियांवाला बाग नरसंहार (1919) पर नई किताब कहती है कि ब्रिटिश सरकार ने अब तक माफी नहीं मांगी, केवल इसे 'ब्रिटिश इतिहास का गहन लज्जास्पद घटना' कहा है। पुस्तक में पाइका संगम (ओडिशा की 1800 के दशक की किसान विद्रोह) पर नया खंड जोड़ा गया है, जिसका पहले उल्लेख न होने पर आलोचना हुई थी। यह पाठ्यपुस्तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा 2023 के अनुरूप विकसित की गई है। एनसीईआरटी निदेशक डी पी सकलानी ने टिप्पणी के अनुरोध पर कोई जवाब नहीं दिया।