अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला है जो थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है और मॉनसूनी वर्षा को बढ़ावा देती है। यह चार राज्यों के 29 जिलों में फैली हुई है और 5 करोड़ लोगों की जलवायु, पानी तथा जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है। हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इसकी परिभाषा पर विवाद खड़ा कर दिया है।
अरावली पर्वतमाला लगभग 670 किलोमीटर लंबी और 25 करोड़ वर्ष पुरानी है। यह गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों में फैली हुई है, जहां करीब 5 करोड़ लोग रहते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह रेंज मॉनसूनी हवाओं को रोककर ओरोग्राफिक वर्षा उत्पन्न करती है, जिससे राजस्थान और दिल्ली-एनसीआर में 20-30% अधिक बारिश होती है। यदि अरावली न होती, तो थार रेगिस्तान पूर्व की ओर फैल जाता, सूखा बढ़ता और धूल भरी आंधियां आम हो जातीं।
यह पर्वतमाला भूजल को रिचार्ज करती है, मिट्टी कटाव रोकती है और कार्बन सिंक के रूप में जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करती है। जैव विविधता के लिहाज से, यहां 31 प्रकार के स्तनधारी जैसे तेंदुआ और स्लॉथ बियर, 300 से अधिक पक्षी प्रजातियां, 200 से ज्यादा पौधे जैसे धोक, बबूल और नीम पाए जाते हैं। औषधीय पौधों में ब्राह्मी, गुग्गुल और हडजोड़ शामिल हैं। अरावली में 20 से अधिक अभयारण्य हैं, जिनमें सरिस्का टाइगर रिजर्व और रणथंभौर नेशनल पार्क प्रमुख हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा, जिससे 90% क्षेत्र खतरे में पड़ गया है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सफाई दी कि पर्यावरण की अनदेखी नहीं होगी। अवैध खनन और शहरीकरण से खतरा बढ़ रहा है, जो मानव-वन्यजीव संघर्ष को जन्म दे सकता है। वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि यदि संरक्षण न हुआ, तो 10-20 वर्षों में उत्तर भारत में जलवायु संकट गहरा सकता है। अरावली से पर्यटन और वन उत्पादों के माध्यम से हजारों करोड़ का आर्थिक योगदान भी होता है।