रायसीना डायलॉग 2026 में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरानी फ्रिगेट आईआरआईएस डेना को डुबोने के बाद भारत द्वारा आईआरआईएस लावन को कोच्चि में डॉक करने की अनुमति देने पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह निर्णय मानवीय आधार पर लिया गया था और भारत यूएनसीएलओएस तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का समर्थन करता है। जयशंकर ने हिंद महासागर की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को समझने पर जोर दिया।
7 मार्च 2026 को नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने ईरानी नौसेना के जहाजों से जुड़े हालिया घटनाक्रम पर पहली बार अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने स्पष्ट किया कि 28 फरवरी को ईरान की ओर से आईआरआईएस लावन के तकनीकी समस्या के कारण कोच्चि में आपातकालीन डॉकिंग की अनुमति मांगी गई थी, जिसे 1 मार्च को मंजूरी दी गई। यह जहाज 15 से 25 फरवरी तक विशाखापत्तनम में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और मिलन 2026 नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद लौट रहा था। 4 मार्च को यह कोच्चि पहुंचा, जहां इसके 183 चालक दल के सदस्य, जिनमें कई युवा कैडेट शामिल थे, नौसेना सुविधाओं में ठहर रहे हैं।
जयशंकर ने कहा, 'ईरान की ओर से संदेश मिला था कि एक जहाज, जो उस वक्त भारत की सीमाओं के सबसे निकट था, बंदरगाह में आने की इच्छा जता रहा था। जहाज में तकनीकी समस्या थी।' उन्होंने जोड़ा कि जब जहाज यहां आया, तब स्थिति अलग थी और वे घटनाओं के गलत पक्ष में फंस गए। 'हमने मानवता के नजरिए से स्थिति को देखा और मुझे विश्वास है कि हमने सही कदम उठाया है।'
उसी दिन, 4 मार्च को, आईआरआईएस डेना पर अमेरिकी पनडुब्बी ने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टॉरपीडो हमला किया, जिससे जहाज डूब गया। यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट से लगभग 40 समुद्री मील दूर गाले के पास हुई। श्रीलंकाई अधिकारियों ने 87 शव बरामद किए, 32 लोगों को बचाया गया, जबकि दर्जनों लापता हैं। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ ने हमले की पुष्टि की और कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार था जब अमेरिका ने टॉरपीडो से दुश्मन जहाज डुबोया। ईरान के डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर सईद खतीबजादेह ने दावा किया कि डेना उस समय 'अनार्म्ड और अनलोडेड' था।
भारतीय नौसेना ने कोलंबो के एमआरसीसी से डिस्ट्रेस कॉल मिलने पर सर्च एंड रेस्क्यू ऑपरेशन में सहायता दी। जयशंकर ने हिंद महासागर की जटिलताओं का जिक्र करते हुए कहा कि डिएगो गार्सिया पांच दशकों से मौजूद है, जिबूती में विदेशी ठिकाने इस सदी के पहले दशक में बने, और हंबनटोटा का विकास इसी दौरान हुआ। उन्होंने भारतीय व्यापारी जहाजों के चालक दल और खाड़ी में रहने वाले 9-10 मिलियन भारतीयों की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त की।