सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए हत्या के प्रयास के दोषियों की तीन साल की सजा बहाल की है। कोर्ट ने पीड़ित को मुआवजा बढ़ाकर जेल की सजा कम करने की प्रथा को खतरनाक बताया। कोर्ट ने सजा निर्धारण के लिए दिशानिर्देश भी जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश को पलट दिया, जिसमें हत्या के प्रयास के दोषियों की सजा को पहले ही काट चुके समय तक कम कर दिया गया था। जस्टिस राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा कि पीड़ित को मुआवजा बढ़ाकर सजा कम करना एक खतरनाक प्रथा है, जो समाज को गलत संदेश दे सकती है कि अपराधी पैसे देकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं।
मामला 2009 का है, जब सिवागंगा जिले में पूर्व शत्रुता के कारण आरोपी ने पीड़ित पर चाकू से हमला किया। पीड़ित को छाती, पसलियों, पेट और हाथ पर चार चाकू के घाव लगे। ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपी को आईपीसी की धारा 307, 326 और 324 के तहत दोषी ठहराया और तीन साल की कठोर कारावास तथा 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। अपीलीय अदालत ने इसे बरकरार रखा, लेकिन हाईकोर्ट ने जेल अवधि को काटे गए समय तक सीमित कर दिया और जुर्माना 50,000 रुपये कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा का उद्देश्य अपराध को रोकने के लिए निवारक प्रभाव पैदा करना है। मुआवजा पीड़ित की पुनर्वास के लिए है, न कि सजा का विकल्प। कोर्ट ने सजा निर्धारण के दिशानिर्देश दिए: 'जस्ट डेजर्ट्स' सिद्धांत का पालन, अपराध और सजा के बीच समानुपातिकता, मामले के तथ्यों पर विचार, सार्वजनिक विश्वास बनाए रखना, और उकसाने वाले तथा क्षमादान योग्य कारकों का संतुलन।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी चार सप्ताह में ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें और शेष सजा काटें। यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में सजा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।