सुप्रीम कोर्ट ने एक बुजुर्ग दंपति की आग से मौत के मामले में बेटे और बहू की बरी को बरकरार रखा है, जिसमें जांच की खामियों की कड़ी आलोचना की गई। अदालत ने कहा कि जनता की धारणा या व्यक्तिगत पूर्वाग्रह पर आधारित मामलों से निर्दोष प्रभावित होते हैं और अपराधी बच जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में टिप्पणी की, जिसमें एक बुजुर्ग दंपति का घर आग से जल गया था और उनके छोटे बेटे तथा बहू पर हत्या का आरोप लगाया गया था।
मामला संपत्ति विवाद से जुड़ा था, जहां अभियोजन पक्ष ने मृतक के कथित मरने से पहले के बयान और मकसद पर भरोसा किया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी ठहराया, लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों को अविश्वसनीय मानते हुए बरी कर दिया। जस्टिस संजय कुमार और के विनोद चंद्रन की बेंच ने बड़े बेटे की अपील खारिज कर दी।
अदालत ने कहा, “ओवरजीलस जांच उतनी ही घातक है जितनी सुस्त या देरी वाली। जनता की धारणा और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह पर मामला बनाना अव्यवस्था पैदा करता है, जो निर्दोष को खतरे में डालता है और हमेशा अपराधी को छोड़ देता है।”
कोर्ट ने जांच को 'शैम' करार दिया, जिसमें आग के कारण की जांच नहीं हुई और आरोपी की घटनास्थल पर मौजूदगी साबित नहीं हुई। मरने से पहले के बयान को धारा 32, भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत महत्वपूर्ण माना, लेकिन इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए।
अदालत ने जांचकर्ताओं को चेतावनी दी कि आपराधिक न्याय में उचित प्रक्रिया का पालन करें, खासकर जब झूठे आरोप लगने की संभावना हो। इस मामले ने आरोपी दंपति और उनके बच्चों पर गहरा प्रभाव डाला।