मेघालय और इलाहाबाद हाईकोर्ट के प्रगतिशील रिश्तों पर फैसले

मेघालय हाईकोर्ट ने 'रोमियो-जूलियट' मामलों में सहमति वाले किशोर संबंधों पर POCSO मुकदमे रद्द करने की अनुमति दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शादीशुदा व्यक्ति वयस्क महिला के साथ सहमति से लिव-इन रह सकता है। ये फैसले व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करते हैं।

मेघालय हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और जस्टिस एचएस थांगखीव की बेंच ने कहा कि किशोरों के बीच सहमति वाले संबंधों में POCSO एक्ट के तहत मुकदमे BNSS की धारा 528 के तहत रद्द किए जा सकते हैं। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में शिक्षा, करियर और जीवन बर्बाद होने का खतरा है, जब तक जबरदस्ती या शोषण न हो।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने फैसला दिया कि शादीशुदा पुरुष का वयस्क महिला के साथ सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने नैतिकता और कानून को अलग बताया। हालांकि, उसी कोर्ट की एक सिंगल बेंच ने शादी के बिना तलाक लिए लिव-इन को वैधता देने से इनकार किया।

ये फैसले संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को रेखांकित करते हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों जैसे लता सिंह और हदिया मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने प्रेम को अपराध की श्रेणी से बाहर रखा।

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सुप्रीम कोर्ट ने सहमति से बने रिश्तों के टूटने के बाद रेप के आरोप लगाने के खिलाफ चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि यह आपराधिक न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग है और न्यायपालिका पर बोझ बढ़ाता है।

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दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि शादी का आश्वासन देकर शारीरिक संबंध बनाने के बाद कुंडली न मिलने के आधार पर शादी से इनकार करना भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत धोखाधड़ीपूर्ण साधनों से यौन संबंध बनाने के अपराध को आकर्षित कर सकता है। जस्टिस स्वरना कांता शर्मा ने आरोपी को जमानत देने से इनकार करते हुए टिप्पणी की कि आरोपी ने बार-बार शादी का आश्वासन दिया था, भले ही परिवार कुंडली मिलान पर जोर देता था। अदालत ने कहा कि यह केवल संबंध खराब होने का मामला नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने फैसला सुनाया है कि केवल वैवाहिक कलह अबेटमेंट टू सुसाइड के आरोपों का आधार नहीं बन सकती। पिछले सप्ताह पारित आदेश में कोर्ट ने 2019 के अमरावती मामले को रद्द कर दिया, जिसमें प्रत्यक्ष उकसावे की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

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राजस्थान हाईकोर्ट ने 30 मार्च के अपने फैसले से ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन अधिनियम, 2026 की आलोचना करने वाले हिस्सों को हटा दिया है, कहा कि वे गलती से शामिल हुए थे। 2 अप्रैल को स्पष्टीकरण आदेश जारी करते हुए बेंच ने कहा कि ये टिप्पणियाँ न तो नियोजित थीं और न आवश्यक। मामला राजस्थान पुलिस में कार्यरत एक ट्रांसजेंडर महिला की याचिका से संबंधित है।

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