सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार की एक अपील खारिज करते हुए उस पर 25,000 रुपये का जुर्माना लगाया। यह अपील पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ थी, जिसमें सीआईएसएफ कांस्टेबल को बहाल किया गया था। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सरकार को न्यायिक लंबित मामलों का सबसे बड़ा कारण बताया।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्जल भuyan ने यूनियन ऑफ इंडिया की स्पेशल लीव पिटिशन को खारिज कर दिया। यह मामला सीआईएसएफ कांस्टेबल के बर्खास्तगी के खिलाफ था, जो 11 दिनों की अनधिकृत अनुपस्थिति और कथित कदाचार के आरोपों पर आधारित था। हाईकोर्ट ने दोनों फैसलों में बर्खास्तगी को असंगत पाया और बहाली का आदेश दिया।
जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की, "पेंडेंसी, पेंडेंसी; सबसे बड़ा लिटिगेंट कौन है?" उन्होंने कहा कि सरकार न्यायिक लंबितगी पर चिंता जताती है लेकिन खुद इसका सबसे बड़ा स्रोत है। बेंच ने सवाल उठाया कि हाईकोर्ट के समवर्ती फैसलों के बावजूद अपील क्यों दायर की गई।
कांस्टेबल पर आरोप था कि उसने सहकर्मी कांस्टेबल की बेटी के भागने में मदद की, जो बाद में उसके भाई से शादी कर ली। कोर्ट ने नोट किया कि अनुपस्थिति मेडिकल लीव के दौरान थी और महिला ने कोई शिकायत नहीं की। यूनियन ने बैक वेजेस का विरोध किया लेकिन कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
यह टिप्पणी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सम्मेलन में जस्टिस नागरत्ना की आलोचना से मेल खाती है, जहां उन्होंने सरकार को लिटिगेशन का सबसे बड़ा जनरेटर बताया।