इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019 की धारा 7 के तहत जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्रमाणपत्र पासपोर्ट में लिंग बदलने के लिए निर्णायक प्रमाण है। अदालत ने कहा कि इसके बाद पासपोर्ट प्राधिकरण अतिरिक्त चिकित्सा जांच या जन्म प्रमाणपत्र में बदलाव की मांग नहीं कर सकते। यह फैसला खुश आर गोयल की याचिका पर पारित किया गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक बेंच ने 10 फरवरी को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मजबूत किया गया। जस्टिस अतुल श्रीधरन और सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने फैसला दिया कि ट्रांसजेंडर पर्सन्स एक्ट की धारा 5 और 6 के तहत जारी पहचान प्रमाणपत्र, और उसके बाद लिंग परिवर्तन सर्जरी के बाद धारा 7 के तहत संशोधित प्रमाणपत्र, पासपोर्ट प्राधिकरण के लिए बाध्यकारी है।
याचिकाकर्ता खुश आर गोयल ने 18 साल की उम्र में लिंग परिवर्तन सर्जरी कराई और पुरुष के रूप में पहचान करने लगे। जिला मजिस्ट्रेट ने उन्हें पुरुष घोषित करने वाला प्रमाणपत्र जारी किया। लेकिन पासपोर्ट कार्यालय ने लिंग बदलने के आवेदन पर नई चिकित्सा जांच और जन्म प्रमाणपत्र में संशोधन की मांग की, जिसके खिलाफ गोयल ने हाईकोर्ट का रुख किया।
अदालत ने कहा कि यह मांग एक्ट और नियमों के विपरीत है। "हम पाते हैं कि विवादित आदेश विशेष एक्ट का उल्लंघन करता है," बेंच ने कहा। एक्ट का उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को गरिमा, समानता और संरक्षण प्रदान करना है, और प्रशासनिक बाधाएं इसके उद्देश्य को विफल करती हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला मजिस्ट्रेट का प्रमाणपत्र विवाद को समाप्त करता है, और पासपोर्ट सहित आधिकारिक दस्तावेजों में बदलाव के लिए कोई अतिरिक्त दस्तावेज की जरूरत नहीं। 2019 में पारित एक्ट ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए प्रमाणपत्र जारी करने की स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित करता है, जिसमें शपथ पत्र पर आधारित आवेदन 30 दिनों में प्रोसेस किया जाता है। नियमों के अनुसार, पासपोर्ट 18 आधिकारिक दस्तावेजों में से एक है जिनमें यह प्रमाणपत्र आधार पर बदलाव हो सकता है।
इस फैसले से ट्रांसजेंडर समुदाय को सरकारी सेवाओं में आसानी मिलेगी, बिना अतिरिक्त बाधाओं के।